शहर दर शहर लिए फिरता हूँ तन्हाई को
कौन सा नाम दूँ मैं तेरी शनासाई को
कोई महफ़िल हो तेरा नाम तो आ जाता है
जान कर साथ लगा रखा है रुसवाई को
जिस तरफ जाइये, है खोखले लफ़्ज़ों का हुजूम
कौन समझे यहाँ आवाज़ की गहराई को ,
खूब वाकिफ हूँ मैं दुनिया के चलन से
मैंने परबत नहीं समझा है कभी राई को
शहर दर शहर लिए फिरता हूँ तन्हाई को
कौन सा नाम दूँ मैं तेरी शनासाई को
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